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Korba Breaking- पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव कथा में 21 हजार में पास बेचने का खुलासा, गरीब श्रद्धालु बोले – क्या हमारी आस्था सस्ती है?

धर्म के नाम पर कारोबार? आम श्रद्धालुओं से चंदा लेकर किया गया भेदभाव!

Korbavani.com- जिले में भक्ति और श्रद्धा से जुड़ी शिव महापुराण कथा इस बार विवादों के घेरे में है। पंडित प्रदीप मिश्रा के शिव कथा वाचन के इस आयोजन को लेकर अब एक गंभीर आरोप सामने आया है, जिसमें आयोजन समिति श्री महाकाल भक्त मंडल कोरबा द्वारा 21,000 रुपये में विशेष पास बेचे जाने का मामला उजागर हुआ है। वायरल हो रही एक ऑडियो क्लिप में कथित रूप से समिति के कोषाध्यक्ष शैलेश शुक्ला के रिस्तेदार यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि “21 हजार दो, पास लो, सामने बैठ कर कथा सुनो।” यानी अब यह आयोजन पैसे देने वालों के लिए विशेष सुविधा देने का माध्यम बन गया है, जिससे श्रद्धालुओं में गहरी नाराजगी देखी जा रही है।

इससे पहले भी आयोजन स्थल को लेकर असमंजस था — दो से तीन बार स्थल परिवर्तन के बाद अब यह आयोजन 12 से 18 जुलाई तक ट्रांसपोर्ट नगर मीरा रिसोर्ट परिसर में हो रहा है, जहां केवल 300 लोगों को प्रतिदिन प्रवेश की अनुमति दी गई है। अब जब यह सामने आया है कि पैसे देने वालों को पास देकर सामने बैठने की अनुमति दी जा रही है, तो आम श्रद्धालुओं का गुस्सा भड़क गया है। लोगों का कहना है कि इस आयोजन के लिए कोरबा जिलेभर से करोड़ों रुपए का चंदा पहले ही लिया गया, फिर भी उन्हें अब बाहर रखा जा रहा है। मोबाइल नंबर 6263819086 पर जब संवाददाता ने संपर्क किया तो सामने आया कि समिति ने स्वयं 21 हजार रुपए में पास दिए जाने की बात स्वीकारी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि धार्मिक आयोजन में अब आर्थिक वर्गों के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है।

एक स्थानीय श्रद्धालु ने कहा —“हमने दिल से चंदा दिया, प्रचार में भाग लिया, लेकिन अब हमें अंदर भी नहीं जाने दे रहे। क्या गरीबों की भक्ति सस्ती है?

श्रद्धालुओं की प्रतिक्रियाएं

सीताबाई वर्मा दर्री निवासी ने कहा– हम तो रोज़ कथा सुनने की आस में आ रहे थे, लेकिन जब पता चला कि सामने बैठने के लिए 21 हजार देने पड़ते हैं, तो दिल टूट गया। क्या हमारी भक्ति अब पैसे से तौली जाएगी?

कमला तीवारी ने कहा – हम महिलाएं तो सुबह से लाइन में लगती हैं, फिर भी अंदर जाने नहीं देते। कहते हैं – पास नहीं है। जब धर्म का दरवाज़ा भी पैसों से खुले, तो गरीब क्या करे?

वहीं समिति के एक सदस्य ने कहा- हमने प्रचार में पोस्टर लगाए, लोगों को बुलाया, चंदा भी दिया। अब जब कथा शुरू हुई तो हमें बाहर खड़ा कर दिया गया। जो पैसे वाला है वही सामने बैठेगा? ये भक्ति नहीं, धंधा है।

इस पूरे मामले ने धार्मिक आयोजनों की पारदर्शिता और नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब धर्म को पैसे से जोड़ दिया जाए, तो आस्था आहत होती है। अब जिलेभर में यह मांग उठ रही है कि श्री महाकाल भक्त मंडल समिति को इस पूरे प्रकरण पर सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना चाहिए, ताकि धर्म के नाम पर व्यापार और भेदभाव जैसी प्रवृत्तियों पर रोक लग सके।

Kush Sharma

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