Korbavani.com- स्व. बिशाहू दास महंत जिला अस्पताल, कोरबा में दवाओं की कमी एक बार फिर से गंभीर चिंता का विषय बन गई है। शासन की महत्वाकांक्षी “निशुल्क उपचार” योजना अब कागज़ों तक ही सीमित नजर आ रही है। मरीजों को ज़रूरी दवाएं अस्पताल की फार्मेसी में नहीं मिल रही हैं, जिससे उन्हें मजबूरी में निजी मेडिकल स्टोर से महंगे दामों में दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। गौरतलब है कि 27 अप्रैल को KV News ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था, जिसके बाद जिला स्वास्थ्य विभाग ने दवा आपूर्ति व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, स्थिति जस की तस बनी हुई है।
हर माह 2-3 करोड़ की खपत, फिर भी स्टॉक शून्य– प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल में प्रतिमाह लगभग 2 से 3 करोड़ रुपये की दवाओं की खपत होती है। नियमानुसार अस्पताल में कम से कम 15 दिन से लेकर एक महीने तक की दवाओं का स्टॉक अनिवार्य रूप से होना चाहिए, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है. जब KV News की टीम ने अस्पताल प्रबंधन से स्थिति की जानकारी ली, तो अधिकारियों ने स्वयं स्वीकार किया कि कई आवश्यक दवाएं स्टॉक से पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।“
बाहर से खरीदनी पड़ी दवा– मरीज के परिजनएक मरीज के परिजन ने बताया, “डॉक्टर ने संक्रमण की दवा लिखी, लेकिन अस्पताल में नहीं मिली। हमें मजबूरी में बाहर से महंगे दामों में खरीदनी पड़ी।”सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जो दवाएं अस्पताल के भीतर उपलब्ध नहीं हैं, वही दवाएं अस्पताल परिसर के निजी मेडिकल स्टोर्स में आसानी से मिल रही हैं। यह स्थिति आपूर्ति व्यवस्था में संभावित भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर स्पष्ट संकेत देती है।
प्रशासनिक अनभिज्ञता और डॉक्टरों की मजबूरी- जब इस संबंध में मेडिकल सुपरीटेंडेंट से सवाल किया गया, तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की। वहीं एक डॉक्टर ने बताया, “हम मरीज की जरूरत के अनुसार दवा लिखते हैं, लेकिन उपलब्धता हमारे नियंत्रण में नहीं होती।”
अब ज़रूरत है सख्त कार्रवाई की- जनता के बीच बढ़ती नाराजगी के बीच अब ज़रूरी हो गया है कि स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर स्थिति का संज्ञान ले, दवा आपूर्ति और वितरण प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करे, और लापरवाह अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए। अन्यथा यह लापरवाही किसी बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी का कारण बन सकती है।




