बड़े झाड़ के जंगल को कागजों में कृषि भूमि दर्शाने का आरोप, पर्ची जारी करने में पटवारी की भूमिका संदेह के घेरे में; शिकायत के बाद भी जांच अधूरी…
Korbavani.com। कोरबा-बरपाली तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत तुमान से सामने आए इस मामले ने राजस्व और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बड़े झाड़ के जंगल की जमीन को राजस्व दस्तावेजों में ढाई-ढाई एकड़ के कृषि रकबे के रूप में दर्शाकर धान बिक्री की पर्चियां तैयार कराई गईं। इतना ही नहीं, इसी जमीन के नाम पर लगातार दो वर्षों तक धान की बिक्री किए जाने का दावा भी किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, कथित तौर पर मोटी रकम लेकर कृषि भूमि की पर्चियां तैयार की गईं और दो वर्षों में तीन लाख रुपये से अधिक मूल्य का धान बेचा गया। बताया जाता है कि पूर्व में धान खरीदी के दौरान मामला सामने आने पर धान जब्ती की कार्रवाई भी की गई थी। इसके बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि संबंधित जमीन की वास्तविक स्थिति क्या है और कृषि भूमि के रूप में पर्चियां किस आधार पर जारी की गईं।
जंगल में खेत कहां से आया? मामले में सबसे अहम सवाल जमीन की वास्तविक प्रकृति को लेकर है। यदि संबंधित भूमि बड़े झाड़ के जंगल के रूप में दर्ज है और मौके पर भी जंगल मौजूद है, तो वहां कृषि भूमि का रकबा कैसे तैयार हुआ? क्या पर्ची जारी करने से पहले पटवारी ने स्थल निरीक्षण किया था? क्या राजस्व अभिलेखों में भूमि की प्रकृति बदली गई या बिना वास्तविक खेती के ही धान बिक्री की पात्रता तैयार कर दी गई? इन सवालों के जवाब अब तक सामने नहीं आए हैं। पर्ची जारी करने की प्रक्रिया में पटवारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की मांग उठ रही है।
जनदर्शन से मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक पहुंची शिकायत- इस मामले को लेकर जागरूक नागरिकों ने संबंधित अधिकारियों के साथ जनदर्शन में भी शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि बार-बार ध्यानाकर्षण कराने के बावजूद प्रभावी जांच नहीं हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत की गई। शिकायत के आधार पर करतला वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, लेकिन बारिश के कारण जांच पूरी नहीं हो सकी। नतीजतन, जमीन की वास्तविक स्थिति और कथित अनियमितताओं को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
पटवारी का पक्ष नहीं मिला, समिति के पास एक साल का रिकॉर्ड- इस संबंध में संवाददाता ने पटवारी कांति चंद्रा से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया, लेकिन फोन रिसीव नहीं होने के कारण उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका। वहीं, तुमान उपार्जन केंद्र समिति के प्रबंधक ने बताया कि उनके पास केवल एक वर्ष का रिकॉर्ड उपलब्ध है।
संयुक्त जांच से खुल सकता है पूरा मामला- अब इस प्रकरण में वन और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम से निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठ रही है। संबंधित जमीन का सीमांकन, वन भूमि एवं राजस्व अभिलेखों का मिलान, पर्ची जारी करने की प्रक्रिया और पिछले दो वर्षों के धान खरीदी रिकॉर्ड का सत्यापन जरूरी है। साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि धान की बिक्री किसके नाम पर हुई और भुगतान किस खाते में किया गया। फिलहाल मामला कई गंभीर सवालों के बीच अटका हुआ है। यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल धान खरीदी में अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि वन भूमि के रिकॉर्ड और सरकारी खरीदी व्यवस्था की निगरानी पर भी बड़ा सवाल है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग कब पूरी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाते हैं। तहसीलदार ने कहा जांच कर करवाई की जाएगी..




