Korbavani.com- कोरबा स्व. बिसाहूदास महंत जिला अस्पताल में दवाओं की भारी किल्लत एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है। इलाज के लिए आने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों को डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाएं अस्पताल में नहीं मिल रही हैं, जिससे उन्हें निजी मेडिकल दुकानों से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
खर्च करोड़ों का, फिर भी खाली स्टॉक– सूत्रों के अनुसार अस्पताल में हर महीने 3 से 4 करोड़ रुपये तक की दवाओं की खपत होती है, लेकिन प्रबंधन तब तक नई खेप नहीं मंगवाता जब तक दवाएं पूरी तरह खत्म न हो जाएं। इसका नतीजा यह है कि मरीजों को जरूरी दवाएं बाहर से लेनी पड़ती हैं, जिससे सरकारी अस्पताल की ‘सस्ती इलाज’ योजना पूरी तरह विफल साबित हो रही है।
मरीजों का दर्द– सरकारी अस्पताल में आए, लेकिन जेब पर भारी पड़ा इलाज, दूरदराज़ के गांवों से आने वाले गरीब मरीजों की पीड़ा सबसे अधिक है। इलाज के लिए सरकारी अस्पताल का रुख करते हैं, लेकिन दवाओं के लिए उन्हें बाहर भटकना पड़ता है। इलाज करने आई कमलाबाई कहती हैं, “डॉक्टर ने पर्ची पर तीन दवाएं लिखी, एक भी अस्पताल से नहीं मिली। बाहर से लेने में लगभग 700 रुपये लग गए, वहीं गोढ़ से इलाज कराने आए किसान राम प्रकाश ने बताया, “डॉक्टर ने 5 दवाएं लिखीं, लेकिन सिर्फ दो ही दवाई मिली प्राइवेट मेडिकल से लेने में 600 रुपये लग गए। क्या यह निजी दुकानों को फायदा पहुँचाने की चाल? स्थिति को देखकर आम लोगों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या डॉक्टर जानबूझकर ऐसी दवाएं लिख रहे हैं, जो अस्पताल स्टोर में नहीं होतीं? और अगर दवाएं नहीं हैं, तो पर्ची क्यों? क्या यह एक सुनियोजित खेल है जिससे गरीब मरीज निजी दुकानों तक पहुंचें?
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी सवालों के घेरे में– स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों को इन समस्याओं की जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। न दवाओं की आपूर्ति व्यवस्था दुरुस्त की गई, न ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई।
अब क्या जरूरी है?– अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएमेडिकल स्टोर में नियमित स्टॉक बनाए रखने की नीति लागू हो, डॉक्टरों को अस्पताल में उपलब्ध दवाओं की जानकारी दी जाए, जिला प्रशासन द्वारा निगरानी तंत्र बनाया जाए, जब तक इन पहलुओं पर गंभीरता से काम नहीं किया जाएगा, तब तक सरकारी अस्पताल सिर्फ नाम के रह जाएंगे और गरीब मरीजों का दर्द यूं ही बढ़ता रहेगा।




