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Korba Breaking- मंदिर में चोरी की घटनाओं में नाबालिगों की संलिप्तता ने खड़े किए सवाल, आखिर बच्चों को अपराध की राह पर कौन धकेल रहा? …

परिवार की परवरिश, स्कूलों की नैतिक शिक्षा और सामाजिक जागरूकता पर उठे सवाल, केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं रुकेगा बाल अपराध…

Korbavani.com। शहर के कोसाबाड़ी स्थित हनुमान मंदिर में चोरी की दो घटनाओं के बाद एक बार फिर नाबालिगों के अपराध की दुनिया में कदम रखने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मंदिर में हुई पहली चोरी की घटना में पुलिस ने एक विधि से संघर्षरत बालक को पकड़ा है। पूछताछ में उसके अन्य साथियों के साथ मिलकर चोरी करने की बात सामने आई है। वहीं चोरी की संपत्ति खरीदने के संदेह में सुरेश निषाद नामक युवक के कब्जे से चांदी की दो चेन भी बरामद की गई हैं। पुलिस मामले में आगे की जांच कर रही है। थाना सिविल लाइन रामपुर पुलिस के अनुसार, मंदिर में चोरी की दोनों घटनाओं पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 331(4) और 305(ए) के तहत अपराध दर्ज किया गया था। सीसीटीवी फुटेज और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर संदिग्धों की पहचान की गई। इसके बाद पुलिस ने एक नाबालिग को अभिरक्षा में लेकर पूछताछ की। मामले में किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इस घटना का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर समाज को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आखिर कम उम्र के बच्चे अपराध की राह क्यों चुन रहे हैं? क्या उन्हें घर में सही संस्कार और निगरानी नहीं मिल पा रही है? क्या माता-पिता बच्चों की दिनचर्या, संगत और गतिविधियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं? या फिर स्कूलों में नैतिक शिक्षा, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ कहीं पीछे छूटता जा रहा है? बच्चों का अपराध की ओर बढ़ना केवल पुलिस और कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। इसके पीछे पारिवारिक वातावरण, गलत संगत, आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियां, नशे का प्रभाव, मोबाइल और इंटरनेट का दुरुपयोग तथा समय पर मार्गदर्शन नहीं मिलना जैसे कई कारण हो सकते हैं। हालांकि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

माता-पिता की जिम्मेदारी सबसे अहम- बच्चों की पहली पाठशाला उनका घर होता है। माता-पिता को केवल उनकी पढ़ाई और जरूरतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनकी संगत, व्यवहार, दिनचर्या और मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए। बच्चे अचानक अपराध की राह पर नहीं पहुंचते। कई बार उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव समय रहते पहचान लिए जाएं तो उन्हें गलत रास्ते पर जाने से रोका जा सकता है।

स्कूलों और समाज की भी भूमिका- शिक्षकों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं, बल्कि बच्चों में नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करना भी है। वहीं पुलिस को स्कूलों, कॉलेजों और बस्तियों में जागरूकता अभियान चलाकर बच्चों को कानून, अपराध के परिणाम और उनके भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी देनी चाहिए। सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को भी इस दिशा में आगे आना होगा।

सिर्फ कार्रवाई नहीं, सुधार भी जरूरी- कानून का उद्देश्य अपराध पर नियंत्रण के साथ-साथ बच्चों को सुधार का अवसर देना भी है। किशोर न्याय व्यवस्था इसी सोच पर आधारित है। इसलिए नाबालिगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया के साथ उनकी काउंसलिंग, शिक्षा, पारिवारिक मार्गदर्शन और पुनर्वास पर भी ध्यान देना जरूरी है। कोसाबाड़ी मंदिर चोरी की घटना ने एक बार फिर समाज के सामने आईना रख दिया है। सवाल केवल यह नहीं है कि चोरी किसने की, बल्कि यह भी है कि बच्चों को अपराध से दूर रखने के लिए परिवार, शिक्षक, पुलिस और समाज अपनी जिम्मेदारी कितनी निभा रहे हैं। यदि समय रहते बच्चों को सही दिशा, संस्कार और सकारात्मक माहौल नहीं मिला तो ऐसी घटनाएं भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती हैं। बच्चों को अपराधी बनने के बाद सुधारने से बेहतर है कि उन्हें अपराध की राह पर जाने से पहले ही सही दिशा दिखाई जाए।

Kush Sharma

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